Press "Enter" to skip to content

क्या दलित और मुसलमान देश को नई दिशा दे पायेंगे

कई दलित चिंतक और विचारक हैं जो चाहते हैं कि मुस्लिम समाज मे भी सोशल जस्टिस पर एक वैचारिक आंदोलन पैदा हो और हाशिए पर पड़े कमज़ोर मुसलमानों अर्थात पसमांदा की स्थिति में सुधार आए ताकि वह भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सके।विचार काफी अच्छा है और मैं भी इससे सहमत हूँ मगर मुस्लिम समाज का यह आंदोलन ” अम्बेडकरवाद ” की नकल नही होना चाहिए जिसमें दलितों की बदहाली का सारा ठीकरा ब्राह्मणों के सिर पर फोड़ दिया गया है और शेष सारे बिंदुओं को नज़रन्दाज़ कर दिया गया है।

इसी सावधानी को ध्यान में रखते हुए मैंने एक प्रसिद्ध दलित लेखिका को यह मशवरा दिया किआप मुसलमानों की बदहाली पे ज़रूर लिखिए,लेकिन आपको मेरा नेक मशवरा है कि बीच मे इस्लाम पर कोई टिप्पणी न कीजिये,वरना आपके अधूरे इल्म की वजह से आपको लेने के देने पड़ सकते हैं जिसके कारण आप मुसलमानों को ही अपना दुश्मन समझ बैठेंगी।
दूसरी बात यह गलती क़तई न करें कि हिन्दुओ के ब्राह्मनो को इस्लाम के सय्यदों से जोड़ने की गलती न करें। ब्राह्मण और सय्यद में ज़मीन आसमान का अंतर है और दोनों को एक ही तराज़ू पर तौलना ” सब धान बाइस पंसेरी” वाला हिसाब हो जाएगा, जो क़तई दुरुस्त नही है ।

मेरे उक्त कथन पर उन्होंने कहा कि सय्यदवाद ने पसमांदा को कितना डैमेज किया है ,यह आप नही जानते!

मैने जवाब में कहा कि सय्यद और ब्राह्मण की तुलना ही हास्यास्पद और बेमेल है जिसमे कोई साम्य नहीं।क्या किसी सय्यद ने कभी कहा कि पसमांदा अगर क़ुरान की आयत सुने तो उसके कानों में पिघला सीसा डाल दो?

क्या किसी सय्यद पर पसमांदा की परछाईं पड़ जाए तो उसने ग़ुस्ल किया?

क्या किसी सय्यद ने कहा कि वह अल्लाह के मुख से पैदा हुआ और पसमांदा पैरों से?

क्या किसी सय्यद ने पसमांदा को गले मे हांडी और कमर में झाड़ू बांध कर चलने का हुक्म जारी किया?

क्या किसी सय्यद ने देवदासी की तरह पसमांदा की लड़कियों को मस्जिद मदरसे में ले जा कर बलात्कार किये?

क्या किसी “मुस्लिम स्मृति “में कहीं लिखा है कि सय्यद पसमांदा के घर का धन ले जा सकता है क्योंकि यह उसका अधिकार है???

जो लोग ब्राह्मण और सय्यद को एक मान कर अम्बेडकरवाद की ” भौंडी नकल “कर रहे हैं ,उनको बता दूं कि आपको टोटली बेवकूफ बनाया जा रहा है और भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जा रहा है।पसमांदा तहरीक कोई पसमांदा की भलाई की तहरीक नही बल्कि इस्लाम के दुशमनों की एक लुभावनी तहरीक है जिसका मकसद इस्लाम मे एक और तफरका फैला कर मुसलमानों की एकता को कमज़ोर करना और क़ौम को बर्बाद करना है।

पसमांदा तहरीक को “बौद्धिक मसाला ” दलितों से मिल रहा है या देश की साम्प्रदायिक ताक़तों से,यह तो स्पष्ट नही है ; मगर इतना ज़रूर वाजेह है कि यह तहरीक सोशल जस्टिस के नाम पर एक बहुत बड़ा फितना बनता जा रहा है और क़ौम की एकता को खंडित कर रहा है।।दौरे हाज़िरा के अन्य बातिल फ़िरक़ों की तरह इस फिरके से भी भोले भाले मुसलमानों को बचाना ज़रूरी है ; जिस पर हमारे ओलमा को बहुत जल्द चिंतन मनन कर के कोई ठोस कार्य योजना बनानी चाहिए।

Mohammad Arif Dagia की FaceBook वाल से .

Facebook Comments
More from OpinionMore posts in Opinion »

Be First to Comment

%d bloggers like this: