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बचाईए अपनी बेटी को- दिल को चीर देने वाली एक कहानी

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बचाईए अपनी बेटी को

आप या हम किसी बस या ट्रेन में 6-7 या 8 साल की बच्ची को देखते हैं तो मन में क्या भाव आते हैं? ममता उमड़ती है, अंकल या भाई बनकर प्यार आता है, स्नेह पैदा होता है, दिल करता है कि उस बच्ची पर अपना सारा स्नेह उड़ेल दूं, बहुत लोग ऐसा करते भी हैं, परन्तु यह भावना वैसी ही परिस्थीति में किसी बच्चे या किसी के बेटे के लिए आपके या मेरे अंदर जागृति नहीं होगी?

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यही है मानव चरित्र, क्युंकि किसी की छोटी सी बेटी को देखते ही जो ममता उभरती है वह किसी के बेटे को देख कर नहीं उभरती। बहुत पहले मैं एक बार संघमित्रा ऐक्सप्रेस ट्रेन से बैंगलोर से इलाहाबाद आ रहा था, सामने की बर्थ पर एक परिवार की 5-7 साल की बच्ची जान्हवी मुझसे ऐसी घुल मिल गयी कि 48 घंटे के सफर में वह अपने माता पिता से अधिक मेरे साथ रहने लगी।

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जब इलाहाबाद मैं उतरने लगा तो वह इतनी ज़ोर से चीख़ी कि मैं बर्थ पर ही बैठ गया, सोचा जब ट्रेन चलने को होगी तब उतर जाऊंगा, जब ट्रेन चलने को हुई तब वह मुझसे लिपट गयी, और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, उसकी उन चीखों में बेटी की ममता, प्यार और दुलार था, बेटी के दूर हो जाने का चित्कार था। मैं भी मजबूर था, उसके साथ कब तक साथ रहता, उसे पटना जाना था और मुझे इलाहाबाद फिर भी इलाहाबाद नहीं उतरा और उसके सोने का इंतज़ार किया, अगले एक घंटे में उसके माता पिता ने उसे सुला दिया और मैं उस बेटी को धोखा देते हुए मिर्जापुर उतर गया फिर ट्रेन पकड़ कर वापस इलाहाबाद आ गया।

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ट्रेन से उतरने के अगले कुछ घंटे तक मैं विचलित था कि जब जान्हवी उठेगी और मुझे नहीं पाएगी तब उस पर क्या बीतेगी? कैसे मुझे ढूंढेगी? मुझे ना पाने पर कैसे रोएगी, चीखेगी, बेचैन होगी, कैसे उसे चुप कराया जाएगा, इत्यादि इत्यादि। तब मोबाईल का इतना प्रचलन नहीं था, बच्ची के माता-पिता से टेलीफोन नंबर का आदान प्रदान भी नहीं हुआ था, तो बेटी से मतत्व का वह संबन्ध मेरे ट्रेन से उतरने के बाद खो गया पर आज भी यादें शेष है।

जान्हवी जहाँ भी हो खुश रहे , सदैव दुआ करता हूं , ईश्वर से प्रार्थना करता हूं।

यह कैसे मर्द होते हैं जिनमें ममतामई ऐसी छोटी बच्चियों को देख कर वासना जाग जाती है? यह मर्द होते हैं या आदमखोर?

कठुआ में आसिफ़ा के साथ जो हुआ उसकी लड़ाई के बीच अब खबर आई कि सासाराम में 6 साल की बच्ची को चाकलेट दिलाने के बहाने ले जा कर मेराज आलम नाम के किसी ऐसे ही आदमखोर ने उसके साथ बलात्कार किया। आखिरकार ये कैसे प्राणी हैं? ये कैसे मानव हैं जिनमें एक 6-7 साल की बच्ची को देख कर ममता नहीं बल्कि वासना जगती है। और ऐसे कैसे लोग होते हैं जो दो अलग अलग एक जैसी घटनाओं में आरोपी के धर्म को देख कर अलग अलग पक्ष लेते हैं? आरोपी हिन्दू हुआ तो कठुआ की तरह उसका पक्ष और वैसी ही सासाराम में आरोपी मुस्लिम हुआ तो उसमें पीड़िता बच्ची का पक्ष।

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आसिफ़ा का बलात्कार तो वीभत्स है उस से भी ज्यादा वीभत्स है लोगों का खास तौर पर वकीलों का बलात्कारियों के सपोर्ट मे उतरना और श्री राम और भारत माता के नारे लगाना। कैसे लोग हैं कैसी मानसिकता है यह, वही छोटी बच्चियों से बलात्कार की मानसिकता। एक कोमल बच्ची, जो अभी चलना सीख रही है, बोलना और सुनना सीख रही है, दुनिया को समझ रही है, संबन्धों को पहचान रही है उसके जननांगों पर वार करके कौन सी मर्दानगी का परिचय दे रहे हैं हम?

कल्पना करिए कि ऐसी बच्चियाँ उस समय क्या सोचती होंगीं जो अभी ना दुनिया देख पाईं ना समझ पाईं? कल्पना करिए कि वह उस समय क्या सोचती होंगीं कि उनके साथ यह अंकल या यह भाई क्या कर रहे हैं? जबकि वह अभी इन्हीं संबन्धों की ममता पर विश्वास करके किसी के भी पास चली जाती हैं।

सोचिएगा, उसके दर्द, पीड़ा और चीखों की चित्कार को और उसकी जगह अपनी बेटी, बहन रखिएगा तो उसके दर्द का यह एहसास और अधिक होगा। और हम खुद को मर्द भी कहते हैं, दरअसल मर्द नहीं नामर्द हो चुके हैं हम और हमारा पुरुष समाज।

क्या लिखूं? विचलित हूं कि 6-8 साल की बेटी से आज के दौर में बलात्कार हो रहा है, कहीं चाकलेट का लालच देकर तो कहीं उसके जानवर की जगह बता कर और बेटियाँ उनपर यकीं करके फंस जाती हैं।

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मैं अभी इस्लाम की व्यवस्था की बात करूंगा तो कुछ लोग चिढ़ जाएंगे कि आपने अच्छी पोस्ट को आखीर में भी धर्म से जोड़ दिया, पर हकीकत है यह कि इस्लाम ऐसी ही स्थीति से बचने के लिए छोटी बच्चियों को भी नामहरम के साथ अकेलेपन से दूर रखने की बात करता है, थोड़ी उम्र और बढ़ी तो बाप भाई के बिस्तर से अलग उसे सुलाने को कहता है।

सोचिएगा कि यदि ऐसे दरिंदे सोच के लोग अपने करीबी रिश्तेदार ही हुए तो वह ऐसी मासूम ना समझ बेटी का कैसे यौन शोषण कर सकते हैं? और करते ही हैं। बेटी का क्या, वह तो ममता बिखेरती किसी के पास भी चली जाएगी, गोद में बैठ जाएगी, पीठ पर झूल जाएगी, कंधे पर चढ़ जाएगी, इससे बेखबर कि वह जिसके शरीर से लिपटी है वह काम वासना में पागल हो रहा है, उस बेटी को नहीं एहसास कि वह जिसके शरीर पर झूल रही है उसकी नज़र उसके अविकसित जननांगों पर है।

दूर रखिए अपनी बेटियों को नहीं तो ज़ैनब, आसिफ़ा बनाने के लिए हर मोड़ पर, हर घर में मेहताब आलम और सांजी राम मौजूद हैं।

यशोदा की हम जिंस, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, ज़ुलेख़ा की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं , कहाँ हैं ??

#JusticeForAsifa

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