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नितिन ठाकुर

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दुनिया में चार मुसलमान बम फोड़ते थे. महज़ दो उसके खिलाफ बोलते थे और बाकी अपनी अपनी वजहों से चुप रहते थे. इसके बाद दुनिया ने आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ दिया. ऐसा होते देख उन मुसलमानों को बड़ा दुख हुआ जो ना बम फोड़ने में थे और ना बम फोड़नेवालों के समर्थक थे.

ऐसे मुसलमान हर जगह तर्क देते कि आप चंद मुसलमानों की करतूत को पूरे इस्लाम से जोड़ उसे बदनाम क्यों कर रहे हैं? उनके तर्क पर सामनेवाले कहते कि बात आपकी सही है मगर जब अधिकतर मुसलमान इस आतंकवाद के खिलाफ सड़क पर नहीं उतरते जैसे वो गाज़ा के नाम पर उतर आते हैं तो क्यों ना माना जाए कि इस आतंकवाद में वो भी चुप रहकर साथ ही हैं, बस इसीलिए आतंकवाद इस्लामिक है.

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लगता है कुछ दिनों बाद यही हाल हिंदुओं का होनेवाला है. शंभुलाल रैगर और कठुआ जैसी घटनाएं हिंदू समाज की जैसी छवि बना रही हैं उनसे लग रहा है मानो हत्यारों के पीछे सारा समाज ही झंडे उठाए खड़ा है. किसी गैर हिंदू से पहले हिंदू समाज को ही इन दरिंदों को सज़ा देनी चाहिए. अगर ऐसा ना करके हिंदू समाज चुप रहा तो कल आतंकवादी के तौर पर पहचाने जाने के लिए तैयार रहे.

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हिंदू धर्म के नाम पर काली करतूत करनेवालों को कवर देना बंद ना किया गया तो कुछ छवि तो बन ही चुकी है. कुछ दिनों में और भी पुख्ता हो जाएगी. बात हाथ से निकल जाने के बाद सफाई मत दीजिएगा कि सारे धर्म को क्यों बदनाम किया जा रहा है. अपना धर्म और देश इन रेपिस्ट्स और हत्यारों से रीक्लेम कीजिए. ये इसके ठेकेदार बनने लायक कभी नहीं थे. ये उन हिंदुओं का धर्म और देश है जिन्होंने हमला करनेवालों तक के साथ दोस्ती और शादी करके नई तहज़ीबों को पैदा किया.

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(लेखक युवा पत्रकार हैं)