Opinion

नज़रियाः मुसलमान तो देश के कानून का पालन करते हैं, लेकिन ऑनर किलिंग, मॉब लिंचिंग, भ्रूण हत्या करने वाले किस कानून को मानते हैं?

Muslim Mob lynching

नदीम अख़्तर

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मुसलमानों पर हमेशा यह इलज़ाम लगता रहा है कि मुसलमान ‘ देश’ से पहले ‘धर्म ‘को मानता है , आइये आज इस भ्रम का निवारण करते हैं,  जहां तक देश का सवाल है तो देश मे लोकतंत्र है और लोकतंत्र के तीन स्तम्भ हैं –

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1- legislature ( विधायिका)

2- judiciary ( न्यायपालिका) 

3-  Executive or administration ( कार्यपालिका)

विधायिका, चुनाव के द्वारा तय होती है, क्या मुसलमान ने कभी चुनाव प्रक्रिया का विरोध किया  ? क्या कभी बादशाहत या ख़िलाफ़त की मांग की  ? नही न,  अब विधायिका का काम है क़ानून बनाना तो जो क़ानून वहां से बनाये गये कभी उसे मानने से इनकार किया  ? कभी उसके ख़िलाफ़ कोई बग़ावत की  ? नही न,  हां बहुसंख्यक समाज ज़रूर ‘ हिंदू राष्ट्र ‘ की मांग कर रहा है , कोशिश कर रहा है,  आचरण भी हिन्दू राष्ट्र की तरह कर रहा है।

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अब बात आती है न्यायपालिका की, क्या मुसलमान अपने मुक़दमे अदालतों से हल नही कराता  ? बिलकुल कराता है  ? यहाँ तक कि तलाक़ जैसे मुददे पर अदालत का फ़ैसला स्वीकार किया और बाबरी मस्जिद पर अदालत का फ़ैसला मानने के लिए तैयार है, जबकि बहुसंख्यक समाज का बाबरी मस्जिद पर क्या स्टैंड रहा है ? दुनिया 1992 से आज तक देख रही है, उदयपुर मे क्या हुआ सबने देखा,   क्या कोई शरिया अदालत चल रही है? नही  न,  हां बहुसंख्यक समाज मे खाप पंचायतें ज़रूर चल  रही हैं, जिनके फ़ैसले की कहीं कोई अपील नही।

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तीसरी चीज़ कार्यपालिका जो कि क़ानून को लागू कराती है और पालन कराती है तो मुसलमान हमेशा अपने मामले  पुलिस थानों मे लेकर जाता है, न तो चोर के हाथ काटता न अपने हाथ काटने को कहता है,  हालांकि धर्म मे तो यही सज़ा है चोरी की, इसके अलावा टैक्स, बिजली,  पानी,  सड़क इन सबके नियमों का पालन करता है।

बहुसंख्यक समाज न सिर्फ़ ऑनर किलिंग कर रहा है बल्कि मौक़े पर ही सज़ा देने को सही मान रहा है, लेकिन सवाल और आरोप मुसलमानों पर है कि वो देश से पहले धर्म को मानते हैं  जबकि वो देश की व्यवस्था का पूरा पालन कर रहा है सहयोग कर रहा है।

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(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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