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आखिर सरकारें बनती क्यों हैं? हिमांशु कुमार का सनसनी खेज खुलासा

Election system exposed

जब कोई सरकार बनती है तो वह किस लिए बनती है?

सरकार बनाने वाले अरबों रुपया खर्च करके चुनाव जीतते हैं. सरकार बनाने वाले इतना पैसा क्यों खर्च करते हैं. क्या वह जनता की सेवा करने के लिए अरबों रुपया खर्च करके सरकार बनाते हैं? नहीं जनता की सेवा करने के लिए कोई भी सरकार नहीं बनाई जाती. सरकार बनाई जाती है मुनाफा कमाने के लिए. सरकार बनाने के लिए पैसा देते हैं व्यापारी, अमीर, पूंजीपति लोग, कोई भी अमीर सरकार की मदद से ही पैसा कमा पाता है.

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मुनाफा कमाने के लिए देश की ज़मीन, खदानें, पहाड़, नदियाँ समुन्दर पर कब्ज़ा करना ज़रूरी होता है, जनता ज़मीन देने का विरोध करे तो जनता पर गोली चलने के लिए अर्ध सैनिक बलों की ज़रूरत होती है. इसके अलावा बैंकों से अरबों रूपये का क़र्ज़ ज़रूरी होता है, सरकार से लाइसेंस ज़रूरी होता है, इसके अलावा सरकार की नीतियों की पहले से जानकारी की ज़रूरत होती है. इसके अलावा सरकार की नीतियों में अपने मुताबिक बदलाव करवाने की ज़रूरत होती है.

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मजदूर अगर पूरी मजदूरी मांगें तो उन्हें पीटने के लिए सरकार की पुलिस की ज़रूरत होती है,

तब कोई अमीर मुनाफा कमा पाता है. कोई भी पूंजीपति अपनी मेहनत से अमीर नहीं बन सकता. अमीर बनने के लिए सरकार की मदद की अनिवार्य रूप से ज़रूरत होती है. सरकार बनने के बाद नेता और अधिकारी का मुख्य काम इन्हीं पूंजीपतियों के लिए काम करने का होता है. इस काम के बदले में पूंजीपति लोग नेताओं और अधिकारीयों को पैसा देते हैं.

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आप लोगों ने अटल बिहारी बाजपेयी के समय में उनके मूंह बोले दामाद रंजन भट्टाचार्य का नाम सुना होगा. वह आदमी पूंजीपतियों के काम करवाता था और बदले में रिश्वत वसूलता था. आपने मनमोहन सिंह के समय में वित्त मंत्री चिदम्बरम के बेटे का नाम सुना होगा. चिदम्बरम का बेटा बजट आने से पहले ही बजट लीक कर देता था और अपने साथी पूंजीपतियों को शेयर खरीदवा देता था. इस धंधे में उसने अरबों रूपये कमाए, वैसे तो यह अपराध है. लेकिन सत्ता में इतने ऊपर बैठे लोगों को पकड़ना आसान नहीं होता अक्सर यह लोग बच जाते हैं,

आजकल मोदी सरकार में भी यह खेल खुले आम चल रहा है.

आपको अजीत डोभाल का नाम पता होगा. वह आजकल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। अजीत डोभाल को राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ का बन्दा माना जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का आफिस प्रधान मंत्री के आफिस से सटा हुआ होता है। देश की सभी गुप्तचर एजेंसियां, सभी अर्ध सैनिक बल, पुलिस विभाग और सेना के तीनों अंगों के बारे में फैसले और कंट्रोल यहीं से होता है।

यह जो अजीत डोभाल हैं, इनका चरित्र यह है कि छत्तीसगढ़ में मोदी सरकार के आने के बाद अचानक बड़े पैमाने पर आदिवासी महिलाओं से अर्ध सैनिक बलों ने बलात्कार किये, सोनी सोरी के मूंह पर तेज़ाब फेंका गया, पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया, आदिवासियों को मुफ्त कानूनी मदद देने वाली वकीलों को जबरदस्ती बस्तर से निकाल दिया गया। यह सब अजीत डोभाल के इस निर्देश के बाद हुआ कि बहुत हो गया लोकतंत्र का नाटक अब हमें ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेना है। जो बीच में आये उसे रास्ते से हटा दो। उसके बाद सुरक्षा बलों ने आदिवासियों को डराने के लिए बड़े पैमाने पर उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किये और वह सब कुछ किया जो मैंने ऊपर लिखा है।

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आप चौंकिए मत हमारी सरकार अपनी जनता पर यह ज़ुल्म करवाती है।

असल में सरकार को पूंजीपतियों से इतना पैसा मिल चुका होता है कि वह जनता की बात मान ही नहीं सकते। तो इसी अजीत डोभाल का बेटा आजकल भाजपा पार्टी फंड के लिए पैसा कमाने में लगा हुआ है। अजित डोभल के बेटे का नाम है शौर्य डोभाल, जिसने एक संस्था बनाई है। इस संस्था में रक्षा मंत्री समेत कई मंत्री शामिल हैं। यह संस्था पूंजीपतियों, हथियारों के दलालों, कार्पोरेट के मुखियाओं के लिए मीटिंग का आयोजन करती है। इन मीटिंगों में मंत्री लोग आते हैं और सरकार में काम करने वाले बड़े सचिव आदि अफसर भी आते हैं। इन मीटिंगों में ही हथियारों के सौदे होते हैं सरकार हथियार खरीदती है कमीशन तय होता है।

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यहीं पर तय होता है कि आदिवासी इलाकों में किसे कितनी ज़मीन दी जायेगी। बड़े पुलिस अधिकारी और उद्योगपति यहीं पर तय करते हैं कि कितने दिनों में जनता को पीट कर ज़मीन खाली करा ली जायेगी। इसके अलावा अजीत डोभाल का लड़का एक फाइनेंस कम्पनी भी चलाता है। जिसके द्वारा बड़ी कम्पनियों को सरकारी मदद से व्यापार और मुद्रा की अदल बदल में मदद करी जाती है। जब मीडिया ने अजीत डोभाल के बेटे से पूछा कि तुम्हारी संस्था का दिल्ली के हेली रोड पर जो महंगा आफिस है और स्टाफ की बड़ी बड़ी तनख्वाहों के लिए पैसा कहाँ से आता है तो वह जवाब नहीं दे पाया।

असल में यह देश गरीब नहीं है। इसे गरीब बनाया जा रहा है। अगर जनता हिन्दू मुसलमान और बड़ी ज़ात छोटी ज़ात के चक्कर से निकल जाए। तो जनता अपने को लूटने वालों को पहचान भी सकती है और पकड भी सकती है। अभी तो हम खुद को लूटने वालों को ही अपना नेता समझ कर उनके पीछे पीछे घूम रहे हैं।

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