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घोटाले में बदली प्रधानमंत्री ‘मुद्रा योजना’, सरकार की जल्दीबाजी के कारण बैंकों को हुआ 500 करोड़ से ज़्यादा का नुकसान

Pradhanmantri Mudra Yojana scam

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देश में बैंक घोटाले लगातार बढ़ रहे हैं। ये घोटाले इतने ज़्यादा हो गए हैं कि मोदी सरकार की महत्वकांक्षी योजना भी इस से बच नहीं पाई है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की सेहत बिगड़ती जा रही है।

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प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना की शुरुआत स्वरोजगार के नज़रिए से की गई थी। इसकी शुरुआत अप्रैल 2015 में हुई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले तो हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। लेकिन जब वो अपना वादा निभा नहीं पाए तो उन्होंने स्वरोजगार के लिए इस योजना की शुरुआत की। इसके अंतर्गत लोगों को स्वरोजगार के लिए लोन दिए जाते हैं।

‘गुड गवर्नेंस’ का नारा देने वाली मोदी सरकार ने रिकॉर्ड बनाने और उसका प्रचार करने की जल्दी में मुद्रा योजना को घोटालों का घर बना दिया है। हाल में आईं कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़, मुद्रा योजना के अंतर्गत दिए गए लोन में लगातार घोटालों में तब्दील हो रहे हैं।

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जानकारों के मुताबिक, यह स्थिति इसलिए बनी कि सरकार का लक्ष्य पूरा करने के लिए बैंकों द्वारा अनाप-शनाप तरीक़े से क़र्ज़ बांट दिए गए। अब हालत यह है कि स्टेट बैंक द्वारा दिए गए 75 प्रतिशत और ग्रामीण बैंक द्वारा दिए गए 99 प्रतिशत मुद्रा लोन डूबने की स्थिति में पहुंच गए हैं। इससे बैंकों को लगभग 500 करोड़ से ज़्यादा का चूना लगा है।

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देशभर में हो रहे मुद्रा योजना में बैंक घोटाले

छत्तीसगढ़ में मुद्रा योजना के तहत दिए गए क़र्ज़ में से 50 प्रतिशत की वसूली नहीं हो पाई है। यह भी पता चला है कि क़र्ज़ लेने वालों ने अपने आधार में दर्ज स्थायी पते भी बदल लिए। यह देखते हुए अब बैंकों ने भी क़र्ज़ देना मुश्किल कर दिया है। इससे नए नए आवेदक भी प्रभावित हो रहे हैं। सैकड़ों आवेदन लंबित पड़े हैं जिनके आवेदकों को क़र्ज़ नहीं मिल रहा।

राजस्थान के बाड़मेर में पंजाब नेशनल बैंक की दो शाखाओं में कर्ज़ देने की जल्दबाज़ी की मिसाल देखने को मिली। ख़बरों के मुताबिक़, फ़रवरी में सीबीआई ने यहां 80 लाख रुपये के घोटाले का पर्दाफ़ाश किया था। रिपोर्टों की मानें तो नियमों की अनदेखी करते हुए बाड़मेर शाखा ने 26 खाताधारकों को कुल 62 लाख रुपये का क़र्ज़ दे दिया।

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नियमानुसार बैंक मैनेजर या किसी अधिकारी को लोन से संबंधित लोकेशन पर जाकर जांच करनी होती है। लेकिन ऐसा किए बिना ही उसका ज़िक्र लोन से जुड़े दस्तावेज़ों में कर दिया गया। योजना के एक नियम के मुताबिक़, कोई बैंक 25 किलोमीटर के दायरे के बाहर लोन नहीं दे सकता। लेकिन बैंक ने 100 किलोमीटर दूर रहने वाले खाताधारकों को भी लोन दे दिए।

फ़रवरी में ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने राजस्थान के जयपुर में मुद्रा योजना के तहत दिए गए क़र्ज़ में 64 करोड़ रुपये की गड़बड़ी की ख़बर दी थी। सीबीआई ने उस मामले में पीएनबी की एक शाखा के बैंक मैनेजर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। जांच एजेंसी ने मैनेजर के ठिकानों पर छापे भी मारे थे।

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फ़रवरी में ही बिहार में योजनाओं (किसान क्रेडिट कार्ड, मुद्रा योजना आदि) के नाम पर पांच सरकारी बैंकों (बैंक ऑफ इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा) को 500 करोड़ रुपये का चूना लगने की ख़बर आई थी। इन बैंकों के कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने बिचौलियों के साथ मिलकर फ़र्ज़ी प्रमाणपत्र और अन्य संदिग्ध दस्तावेजों के ज़रिये बैंकों से लोन बांट कर उन्हें नुक़सान पहुंचाया।

इस बढ़ते घोटालों के आकड़ों से एक सवाल ये भी खड़ा होता है कि सरकार इस योजना के तहत 11 करोड़ लोगों को जो लोन देने उपलब्धि के रूप में गिना रही है क्या उन लोगों को लोन मिले भी हैं या फिर बैंक अधिकारीयों की मिलीभगत से ये सारा पैसा घोटालों की बलि चढ़ गया है।

Source: http://www.boltaup.com

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