India

लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए मोदी सरकार की बड़ी चाल, JNU में धरना प्रदर्शन पर लगाई गई रोक

JNU administration blackmailing JNU students

JNU administration blackmailing JNU students

Download Our Android App Online Hindi News

2014 में कांग्रेस गयी और बीजेपी आयी। इस सत्ता परिवर्तन को चार साल बीत चुके हैं। इन चार सालों में मोदी सरकार अतीत में जाकर नेहरू की कमियों को खोजती रही। इतना ही नहीं नेहरू के नाम से जुड़ा एक विश्वविद्यालय भी सत्ताधारियों के निशाने पर रहा।

जुड़ें हिंदी TRN से

कभी कथित देशद्रोही नारों के लिए, तो कभी कैंपस में टैंक रखने, कभी 75 फीसदी अटेंडेंस कंपल्सरी को लेकर। ताजा विवाद उपजा है एक Undertaking को लेकर। दरअसल जेएनयू प्रशासन चाहता है कि उसके छात्र भविष्य में किसी भी तरह के प्रदर्शन, धरना, हड़ताल..आदि में शामिल ना हो। इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर छात्रों से Undertaking फॉर्म भरवाया जा रहा है।

ये खबर भी पढ़ें  पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी मीडिया पर निशाना: वह मीडिया किसी काम की नहीं, जो सरकार से सवाल न पूछे

जेएनयू के पीएचडी स्कॉलर दिलीप यादव ने Undertaking फॉर्म की फोटो अपने फेसबुक वॉल पर शेयर करते हुए लिखा है ”JNU admin का नया फरमान दिल्ली high कोर्ट के बहाने अब jnu students को undertaking देनी होगी कोई protest ना करे, students के fundamental rights का गला होटकर … तैयार हो जाएँये अपने अधिकार को देने”

JNU administration blackmailing students

JNU administration blackmailing JNU students

ये Undertaking जेएनयू का गला घोटने जैसा है। प्रदर्शन, धरना, हड़ताल, रैली, बहस… ये सब जेएनयू कल्चर का हिस्सा है। इस कैंपस का लौकतांत्रिक माहौल, आज़ादी ही इसे सबसे अलग बनाता है। ऐसा भी नहीं है कि यहां के छात्र सिर्फ प्रदर्शन, धरना, हड़ताल के नाम पर सिर्फ राजनीति ही करना चाहते हैं।

ये खबर भी पढ़ें  मंदसौर गोलीबारी पर ‘कृषि मंत्री’ का शर्मनाक बयान, कहा- जांच रिपोर्ट आने से जिन्दा नहीं हो जाएंगे ‘किसान’

जेएनयू पढ़ाई के मामले में भी देश का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय है। अगर जेएनयू में सिर्फ राजनीति ही होती है तो इतने सालों से जेएनयू देश में टॉप पर कैसे बना हुआ है? क्यों जेएनयू को सर्वेश्रेष्ठ यूनिवर्सिटी का राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है?

जेएनयू ने इतना कुछ प्रदर्शन, धरना, हड़ताल, रैली, बहस और पढ़ाई करते हुए हासिल किया है। इसलिए ये तर्क बेकार है कि जेएनयू में छात्र सिर्फ राजनीति करते हैं पढ़ाई नहीं। और छात्र राजनीतिक क्यों ना करें? विश्वविद्यालय में राजनीति क्यों ना हो?

भगत सिंह ने जुलाई, 1928 में छात्र राजनीति पर मचे बावल को लेकर एक लेख लिखा है था। भगत सिंह का मानना था कि ”जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है?”

ये खबर भी पढ़ें  ओवैसी के सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर, कहा - विधवाओं की स्थिति पर ध्यान नहीं दे रही है सरकार

Source:http://boltaup.com

You could follow TR News posts either via our Facebook page or by following us on Twitter or by subscribing to our E-mail updates.

Click to comment

You must be logged in to post a comment Login

Leave a Reply

To Top